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मेवात के संत लालदास की कृपा बरसती है 365 साल पुराने शेरपुर मंदिर में, देशभर से आते हैं लाखों अनुयायी
26 Jan, 2026

मेवात के संत लालदास की कृपा बरसती है 365 साल पुराने शेरपुर मंदिर में, देशभर से आते हैं लाखों अनुयायी

संत लालदास का देवलोकगमन संवत 1705 (सन् 1648) में 108 वर्ष की आयु में अलवर रियासत के मेढ़े पर स्थित भरतपुर रियासत के गांव नंगला में हुआ। गांव शेरपुर में उन्हें समाधि दी गई। बाबा लालदास महाराज के मत में जीवन की पवित्रता तथा आचरण की शुद्धता परम ध्येय माना गया है। कहा जाता है कि उनका जन्म हुआ तब भारत में मुगलों का शासन था। उस दौर में संत लालदास ने मांस मदिरा धूम्रपान के त्याग और जीवों पर दया की शिक्षा लोगों को दी। सत्य और सदाचरण करने को कहा।

ऐसेहुआ मंदिर निर्माण : किवदंतीहै कि आगरा के एक व्यवसायी का जहाज समुद्र में डूब रहा था। प|ी के कहने पर व्यापारी ने बाबा को याद किया तो उसका डूबता जहाज किनारे पर गया। बाबा के चमत्कार से उपकृत व्यापारी ने शेरपुर में मंदिर का निर्माण कराया। हालांकि ज्यादातर लोगों का मानना है कि मंदिर बाबा के भक्तों ने बनवाया।

मेवातके महान संत लालदास का शेरपुर स्थित ऐतिहासिक मंदिर उत्तर भारत में सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा केंद्र है। लोक मान्यता है कि संत लालदास के आशीर्वाद से 365 साल से भी पुराने मंदिर की सीमा में कदम रखने मात्र से कष्ट दूर हो जाते हैं। लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं। मंदिर आज भी नया जैसा ही बना हुआ है। पूरे मेवात में शादी, संतान जन्म जैसे शुभ काम में लोग बाबा का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। मंदिर परिसर में संत लालदास की मां माई भोगरी, बहन सरूपा और पहाडा महाराज के स्थान भी हैं, जिनके दर्शन के बगैर बाबा के दर्शन अधूरे माने जाते है। संत लालदास ने अपना लालदासी संप्रदाय भी चलाया, जिसके देशभर में लाखों अनुयायी हैं।

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